Lucknow की रातों में एक अजीब सी नर्मी होती है।
और जब बारिश हो रही हो… तो ये शहर सिर्फ शहर नहीं रहता, एक एहसास बन जाता है।
रात के करीब ग्यारह बजे थे।
हज़रतगंज की सड़कें बारिश से भीग चुकी थीं। दुकानों की आधी लाइट्स बंद हो चुकी थीं, लेकिन सड़क पर अब भी हल्की रौनक बाकी थी।
कबीर अपनी कार धीरे-धीरे सड़क किनारे चला रहा था।
रेडियो पर पुराना गाना बज रहा था —
वो हल्का सा मुस्कुरा दिया।
कुछ गाने इंसान को अचानक अतीत में ले जाते हैं।
बारिश की बूंदें शीशे पर गिर रही थीं, और हर बूंद के साथ उसे उसकी याद आ रही थी।
सहर।
वो लड़की जिसे उसने इसी शहर में चाहा था… और इसी शहर में खो दिया था।
कबीर ने कार एक पुराने कैफ़े के सामने रोक दी।
वही कैफ़े… जहाँ कभी हर बारिश वाली रात उनकी होती थी।
वो अंदर चला गया।
कैफ़े लगभग खाली था।
एक कोने में कोई किताब पढ़ रहा था, काउंटर पर धीमी ग़ज़ल चल रही थी।
कबीर जाकर उसी खिड़की वाली टेबल पर बैठ गया।
“सर, ऑर्डर?”
“दो कॉफी।”
वेटर थोड़ा हैरान हुआ।
“सर… दो?”
कबीर हल्का सा मुस्कुराया।
“हाँ… आदत है।”
वेटर चला गया।
कबीर खिड़की के बाहर बारिश देखने लगा।
उसे वो आखिरी रात याद आ गई…
सहर उसी टेबल पर बैठी रो रही थी।
“मुझे जाना होगा,” उसने कहा था।
“क्यों?”
“क्योंकि हर मोहब्बत मुकम्मल नहीं होती, कबीर।”
“और हम?”
सहर ने उसकी तरफ देखा था…
ऐसे जैसे दिल टूटने की आवाज़ सिर्फ वही सुन पा रही हो।
“हम शायद गलत वक्त में मिले थे।”
उस रात के बाद सहर चली गई।
ना कोई कॉल।
ना कोई मैसेज।
बस लखनऊ की बारिशों में रह गई उसकी याद।
कॉफी आ चुकी थी।
दो कप।
एक उसके सामने… और दूसरा खाली कुर्सी के सामने।
कबीर ने धीरे से दूसरा कप उसकी तरफ सरका दिया।
जैसे वो अब भी सामने बैठी हो।
तभी अचानक कैफ़े का दरवाज़ा खुला।
ठंडी हवा के साथ बारिश की कुछ बूंदें अंदर आईं।
और फिर…
एक जानी-पहचानी आवाज़।
“अब भी मेरे लिए कॉफी ऑर्डर करते हो?”
कबीर का दिल जैसे रुक गया।
उसने धीरे-धीरे ऊपर देखा।
सहर।
काले रंग की शॉल, भीगे बाल और वही आँखें… जिनमें कभी उसने अपना पूरा भविष्य देखा था।
दोनों कुछ पल बिना कुछ बोले एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसे लखनऊ की सारी आवाज़ें अचानक थम गई हों।
सहर धीरे-धीरे उसकी टेबल तक आई।
उसकी नजर दूसरे कॉफी कप पर गई और वो हल्का सा मुस्कुरा दी।
“तुम बिल्कुल नहीं बदले।”
कबीर की आँखों में हल्की नमी उतर आई।
“कुछ इंतजार इंसान को बदलने नहीं देते।”
सहर चुपचाप उसके सामने बैठ गई।
बाहर बारिश अब और तेज हो चुकी थी।
“कैसे हो?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।
कबीर हँस पड़ा।
“तुम्हारे बिना… या तुम्हें फिर देखने के बाद?”
सहर नजरें झुका कर मुस्कुराई।
“अब भी शायराना बातें करते हो।”
“अब भी सुनने लौट आती हो।”
दोनों हल्का सा हँस पड़े।
लेकिन उनकी हँसी में सालों की दूरी छिपी हुई थी।
कुछ देर खामोशी रही।
फिर सहर ने धीरे से कहा —
“मैंने शादी नहीं की।”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
सहर की आँखें भर आईं।
“क्योंकि दिल ने किसी और को अपनाया ही नहीं।”
बारिश की आवाज़ अब और साफ सुनाई दे रही थी।
कबीर ने पहली बार बिना डर के उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो इस बार जाओगी?”
सहर ने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं।
इस बार लखनऊ छोड़ने का दिल नहीं है।”
कबीर मुस्कुरा दिया।
कैफ़े की खिड़की से बाहर भीगी सड़कें चमक रही थीं।
रात और गहरी हो चुकी थी।
लेकिन उनके बीच की दूरी आखिरकार खत्म हो रही थी।
उस रात लखनऊ सिर्फ बारिश में नहीं भीगा था…
वो फिर से मोहब्बत में भीग गया था।